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जावेद अख़्तर: अपनी महबूबा में अपनी मां देखे, बिन मां के लड़कों की फ़ितरत होती है

जावेद अख्तर
                
                                                         
                            'ऊंची इमारतों से मकां मेरा घिर गया
                                                                 
                            
कुछ लोग मेरे हिस्से का सूरज भी खा गए' 


मशहूर गीतकार जावेद अख़्तर की शायरी और नज़मों का जादू किस पर नहीं चला होगा? गीतकार, शायर होने के साथ साथ वे फ़िल्मों के पटकथा लेखक भी हैं। फ़िल्म साथ-साथ में जगजीत सिंह की आवाज़ में गाई हुई ये ग़ज़ल-

'प्यार जो मुझसे किया तुमने तो क्या पाओगी
मेरे जज़्बात की आंधी में बिखर जाओगी...'


श्रोताओं की रूह का अजीज हिस्सा बन गई। ऐनी आपा के नाम से जानी जाने वाली प्रसिद्ध उपन्यासकार और लेखिका क़ुर्रतुल ऐन हैदर जावेद अख़्तर के ग़ज़ल संग्रह ‘तरकश’में जावेद अख़्तर की शख़्सियत को बयां करती हैं। बकौल ऐनी आपा, जावेद अख़्तर हिंदुस्तानी पॉप-कल्चर के एक निर्माता हैं और मौजूदा हिप्पी-कल्चर के एक रौशन नुमाइंदे हैं। उनकी फ़िल्मों का विवादग्रस्त प्रभाव-क्षेत्र इतना लंबा-चौड़ा है कि उसके मुक़ाबले में एक गंभीर साहित्यिक पुस्तक का एक हज़ार कॉपियों का संस्करण प्रशांत महासागर में तैरते मटर के दाने की हैसियत रखता है लेकिन वह अपने वंश की परंपरा के मुताबिक़ गागर में सागर भर सकते हैं। 

लोहे का पर्दा रूस और पश्चिम के दरमियान से उठकर जब हम दक्षिण एशियावासियों की अक़्लों पर पड़ गया, लिहाज़ा हम एक-दूसरे से और भी ज़्यादा बदगुमान और बदलिल होते जा रहे हैं। चुनांचे जब जावेद अख़्तर कहें - 

'आओ अब हम इसके भी टुकड़े कर लें
ढाका, रावलपिंडी और दिल्ली का चांद' 


ऐनी आपा लिखती हैं, 'बतौर स्क्रिप्ट राइटर जावेद ने बेहद लोकप्रियता प्राप्त की और जब संजीदा शायरी मुझे सुनाई तो मुझे ताज्जुब नहीं हुआ, क्योंकि मछली के बच्चे को तैरना कौन सिखाता है'।

जावेद एक अच्छे बोलने वाले, 'एक अच्छे सोचने वाले, काव्य-समर्थ उत्तर आधुनिक कवि हैं। ताज़गी गहराई और विविधता, भावनाओं की ईमानदारी और ज़िंदगी में नए भावों की तलाश उनकी शायरी की विशेषताएं हैं। नाज़ुक-ख़्याली और फ़सीहुल-बयानी (मंझी भाषा का प्रयोग) उनको विरासत में मिली है। वह कभी-कभी पारंपरिक शेर कह लें मगर बुरी शायरी नहीं कर सकते'। शायरी उन्हें विरासत में मिली है और उनकी रग़ों में दौड़ रही है।

जावेद के पिता जांनिसार अख़्तर प्रसिद्ध प्रगतिशील कवि और मां सफ़िया अख़्तर मशहूर उर्दु लेखिका और शिक्षिका थीं। जावेद के मामा मजाज़ प्रगतिशील आंदोलन के लोकप्रिय कवि थे। अपने दौर के बहुत पढ़े लिखे हज़रात और प्रसिद्ध शायर मुज़्तर ख़ैराबादी जावेद के दादा थे।

उसने लड़कपन में ही तय कर लिया वह दौलतमंद बनेगा

जां निसार अख़्तर बंबई चले गए और फ़िल्मों के लिए लिखने लगे। तब जावेद की मां सफ़िया भोपाल के हमीदिया कॉलेज में मुलाज़मत की और निहायत बहादुरी से अपने दोनों बच्चों को पाला। भारी मानसिक, भावनात्मक और आर्थिक कष्ट बड़े हौसले से झेले और अपने ख़तों के रूप में अपने दुख-दर्द और अपनी आला-हिम्मती का दस्तावेज़ छोड़ गईं।

‘ज़ेरे-लब’सफ़िया अख़्तर के ख़तों के संग्रह का नाम है जिसकी साहित्यिक क्षेत्र में ख़ूब धूम मची। ये तारीफ़ भी मानो वक़्त का ऐसा अजब सितम था कि ये ख़त कहीं कहीं कंपाने वाले हैं मानो मौत की काल-कोठरी से लिखे गए हों। लेकिन इन ख़तों को पढ़कर जावेद अख़्तर की शुरुआती मानसिकता और पालन-पोषण का अंदाज़ा होता है। सफ़िया अपने शौहर को साथी कहकर संबोधित करती हैं। वह दोनों गोया सिपाही हैं जो इंक़लाब के लिए एक सुंदर भविष्य के लिए लड़ रहे हैं। लेकिन कामरेड पतिदेव न आप आवें न भेजें पतियां। ये 1950 से शुरू होते हैं जब जावेद क उम्र महज़ पांच साल की थी।

सफ़िया के ख़त से पता चलता है कि इस उम्र में ही जावेद की इंक़लाबपसंदी अपने ऊरूज पर थी और वे एशिया, रूस और स्तालिन पर संपूर्ण चर्चा कर रहे थे। ऐनी आपा सफ़िया के ख़त का ज़िक्र करती हैं जिसपर 15 अप्रैल 1951 की तारीख़ पड़ी है।

“स्कूल में बच्चों ने क़ौमी झंडे तैयार किए तो जावेद ने दरांती और हथौड़े वाला सुर्ख़ परचम बनाया। जादू पास ही लेटा हुआ है मुझसे अफ़साने गढ़ रहा है। कभी कभी ऐसी अदबी गुफ़्तगू करता है कि हैरान हो जाती हूं। एक दो दिन पहले की बात है, बाई पढ़ने आई थी। उसे मैं जोश मलीहाबादी की एक कविता पढ़ा रही थी। आख़िरी हिस्से में ज़मीं मस्त, फ़लक (आकाश) मस्त की तरकार है। जादू सुनकर बोला–अम्मी यह तो अब्बी के ‘जागा क़लम जागी किताब’से मिलता है। ये उम्र और ये आलोचनापूर्ण निगाहें।

देखो, यह जौहर यूं ही जाया होता है या अपनी पूरी आबो-ताब से चमकता है”। मगर जावेद की मां अपने बेटे की ग़ैर-मामूली कामयाबी देखने के लिए ज़िंदा न रह पाई। मां के बेवक़्त इंतक़ाल के बाद जावेद ने आठ बरस की उम्र से यतीमी और बेघरी की तकलीफ़ें उठाईं। दुनिया वालों के मिलने का अंदाज़ देखकर उनका दिल इतना जला कि उसने लड़कपन में ही तय कर लिया वह ख़ुद दौलतमंद बनेगा"।
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उसने लड़कपन में ही तय कर लिया वह दौलतमंद बनेगा

8 वर्ष पहले

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