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कृष्ण को समर्पित नज़ीर की ये रचनाएं भक्ति से सराबोर कर देंगी

Janmashtami 2018 nazeer akbarabadi poetry for krishna
                
                                                         
                            
नज़ीर अकबराबादी ने अपनी रचनाओं में कृष्ण को जिस तरह से प्रस्तुत किया वह अद्भुत है, पेश हैं उनकी लिखी वह रचनाएं जो कृष्ण को केन्द्र बनाकर लिखी गयीं थीं।

कृष्ण की तारीफ़ में

है सबका ख़ुदा सब तुझ पे फ़िदा
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी
हे कृष्ण कन्हैया, नन्द लला
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी 
 
इसरारे हक़ीक़त यों खोले 
तौहीद के वह मोती रोले 
सब कहने लगे ऐ सल्ले अला 
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी 

सरसब्ज़ हुए वीरानए दिल 
इस में हुआ जब तू दाखिल 
गुलज़ार खिला सहरा-सहरा 
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी 

फिर तुझसे तजल्ली ज़ार हुई 
दुनिया कहती तीरो तार हुई 
ऐ जल्वा फ़रोज़े बज़्मे-हुदा 
ऐ सल्ले अला,
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी

मुट्ठी भर चावल के बदले 
दुख दर्द सुदामा के दूर किए 
पल भर में बना क़तरा दरिया 
ऐ सल्ले अला,
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी 

जब तुझसे मिला ख़ुद को भूला 
हैरान हूँ मैं इंसा कि ख़ुदा 
मैं यह भी हुआ, मैं वह भी हुआ 
ऐ सल्ले अला,
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी 

ख़ुर्शीद में जल्वा चाँद में भी 
हर गुल में तेरे रुख़सार की बू 
घूँघट जो खुला सखियों ने कहा 
ऐ सल्ले अला,
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी 

दिलदार ग्वालों, बालों का 
और सारे दुनियादारों का 
सूरत में नबी सीरत में ख़ुदा 
ऐ सल्ले अला,
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी 

इस हुस्ने अमल के सालिक ने 
इस दस्तो जबलए के मालिक ने 
कोहसार लिया उँगली पे उठा 
ऐ सल्ले अला,
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी 

मन मोहिनी सूरत वाला था 
न गोरा था न काला था 
जिस रंग में चाहा देख लिया 
ऐ सल्ले अला,
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी 

तालिब है तेरी रहमत का 
बन्दए नाचीज़ नज़ीर तेरा 
तू बहरे करम है नंद लला 
ऐ सल्ले अला,
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी 

बाँसुरी

जब मुरलीधर ने मुरली को अपनी अधर धरी
क्या-क्या प्रेम प्रीति भरी इसमें धुन भरी
लै उसमें राधे-राधे की हर दम भरी खरी
लहराई धुन जो उसकी इधर और उधर ज़री
सब सुनने वाले कह उठे जय जय हरी-हरी
ऐसी बजाई किशन कन्हैया ने बांसरी

कितने तो उसकी सुनने से धुन हो गए धनी
कितनों की सुध बिसर गई जिस दम बह धुन सुनी
कितनों के मन से कल गई और व्याकुली चुनी
क्या नर से लेके नारियां, क्या कूढ़ क्या गुनी
सब सुनने वाले कह उठे जय जय हरी-हरी
ऐसी बजाई किशन कन्हैया ने बांसरी

जिस आन कान्हा जी को यह बंसी बजावनी
जिस कान में वह आवनी वां सुध भुलावनी
हर मन की होके मोहनी और चित लुभावनी
निकली जहां धुन, उसकी वह मीठी सुहावनी
सब सुनने वाले कह उठे जय जय हरी-हरी
ऐसी बजाई किशन कन्हैया ने बांसरी

जिस दिन से अपनी बंशी वह श्रीकिशन ने सजी
उस सांवरे बदन पे निपट आन कर फबी
नर ने भुलाया आपको, नारी ने सुध तजी
उनकी उधर से आके वह बंसी जिधर बजी
सब सुनने वाले कह उठे जय जय हरी-हरी
ऐसी बजाई किशन कन्हैया ने बांसरी

ग्वालों में नंदलाल बजाते वह जिस घड़ी
गौऐं धुन उसकी सुनने को रह जातीं सब खड़ी
गलियों में जब बजाते तो वह उसकी धुन बड़ी
ले ले के इतनी लहर जहां कान में पड़ी
सब सुनने वाले कह उठे जय जय हरी-हरी
ऐसी बजाई किशन कन्हैया ने बांसरी

बंसी को मुरलीधर जी बजाते गए जिधर
फैली धुन उसकी रोज़ हर एक दिल में कर असर
सुनते ही उसकी धुन की हलावत इधर उधर
मुंह चंग और नै की धुनें दिल से भूल कर
सब सुनने वाले कह उठे जय जय हरी-हरी
ऐसी बजाई किशन कन्हैया ने बांसरी

बन में अगर बजाते तो वां थी यह उसकी चाह
करती धुन उसकी पंछी बटोही के दिल में राह
बस्ती में जो बजाते तो क्या शाम क्या पगाह
पड़ते ही धुन वह कान में बलिहारी होके वाह
सब सुनने वाले कह उठे जय जय हरी-हरी
ऐसी बजाई किशन कन्हैया ने बांसरी

कितने तो उसकी धुन के लिए रहते बेक़रार
कितने लगाए कान उधर रखते बार-बार
कितने खड़े हो राह में कर रहते इन्तिज़ार
आए जिधर बजाते हुए श्याम जी मुरार
सब सुनने वाले कह उठे जय जय हरी-हरी
ऐसी बजाई किशन कन्हैया ने बांसरी

मोहन की बांसुरी के मैं क्या क्या कहं जतन
लय उसकी मन की मोहनी धुन उसकी चित हरन
उस बांसुरी का आन के जिस जा हुआ बजन
क्या जल पवन "नज़ीर" पखेरू व क्या हिरन
सब सुनने वाले कह उठे जय जय हरी-हरी
ऐसी बजाई किशन कन्हैया ने बांसरी

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बाँसुरी

7 वर्ष पहले

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