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विभाजन

काव्य चर्चा

आजादी...कविताओं से जानें क्या होता है बंटवारे का दर्द...

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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15 अगस्त नजदीक है। आजादी की वर्षगांठ जब भी आती है, तो तिरंगे के स्वाभिमान की चर्चा के बीच बंटवारे का दर्द भी कहीं न कहीं उभर आता है। आजादी मिली, तो कुछ इधर आ गए, कुछ सरहद के उस पार चले गए। कई महिला लेखिकाओं ने बंटवारे की यादों को अपने-अपने ढंग से व्यक्त किया है। इस मौके पर प्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार कृष्णा सोबती की कलम से कुछ यादें।

आजादी एक पवित्र शब्द!
हम में से बहुतों ने, कभी कभी जरूर देखे होंगे-
खेत बंटते
मुंडेर बंटते

घर-आंगन बंटते
पुराने दरवाजे बंद होते
नए रास्ते बनते
चूल्हे अलग होते
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फिर कैसे एक साथ!

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