हिन्दी को समृद्ध करने में कई कवयित्रियों का योगदान है जिन्होंने हिन्दी-भाषी काव्य को अपनी रचनात्मकता के माध्यम से नए आयाम दिए हैं। उदाहरण:
महादेवी वर्मा
तुम मुझमें प्रिय, फिर परिचय क्या!
तारक में छवि, प्राणों में स्मृति
पलकों में नीरव पद की गति
लघु उर में पुलकों की संस्कृति
भर लाई हूँ तेरी चंचल
और करूँ जग में संचय क्या?
तेरा मुख सहास अरूणोदय
परछाई रजनी विषादमय
वह जागृति वह नींद स्वप्नमय,
खेल-खेल, थक-थक सोने दे
मैं समझूँगी सृष्टि प्रलय क्या?
तेरा अधर विचुंबित प्याला
तेरी ही विस्मत मिश्रित हाला
तेरा ही मानस मधुशाला
फिर पूछूँ क्या मेरे साकी
देते हो मधुमय विषमय क्या?
चित्रित तू मैं हूँ रेखा क्रम,
मधुर राग तू मैं स्वर संगम
तू असीम मैं सीमा का भ्रम
काया-छाया में रहस्यमय
प्रेयसी प्रियतम का अभिनय क्या?
महादेवी वर्मा/ जब यह दीप थके तब आना
जब यह दीप थके तब आना
यह चंचल सपने भोले है,
दृग-जल पर पाले मैने, मृदु
पलकों पर तोले हैं;
दे सौरभ के पंख इन्हें सब नयनों में पहुँचाना!
साधें करुणा-अंक ढली है,
सान्ध्य गगन-सी रंगमयी पर
पावस की सजला बदली है;
विद्युत के दे चरण इन्हें उर-उर की राह बताना!
यह उड़ते क्षण पुलक-भरे है,
सुधि से सुरभित स्नेह-धुले,
ज्वाला के चुम्बन से निखरे है;
दे तारो के प्राण इन्ही से सूने श्वास बसाना!
यह स्पन्दन है अंक-व्यथा के
चिर उज्ज्वल अक्षर जीवन की
बिखरी विस्मृत क्षार-कथा के;
कण का चल इतिहास इन्हीं से लिख-लिख अजर बनाना!
लौ ने वर्ती को जाना है
वर्ती ने यह स्नेह, स्नेह ने
रज का अंचल पहचाना है;
चिर बन्धन में बाँध इन्हें धुलने का वर दे जाना!
अमृता प्रीतम/ राजनीति
अमृता प्रीतम की प्रेम कहानी
सुना है राजनीति एक क्लासिक फिल्म है
हीरो: बहुमुखी प्रतिभा का मालिक
रोज अपना नाम बदलता है
हीरोइन: हकूमत की कुर्सी वही रहती है
ऐक्स्ट्रा: लोकसभा और राजसभा के मैम्बर
फाइनेंसर: दिहाड़ी के मज़दूर,
कामगर और खेतिहर
(फाइनांस करते नहीं,
करवाये जाते हैं)
संसद: इनडोर शूटिंग का स्थान
अख़बार: आउटडोर शूटिंग के साधन
यह फिल्म मैंने देखी नहीं
सिर्फ़ सुनी है
क्योंकि सैन्सर का कहना है —
'नॉट फॉर अडल्स।'
आज मैंने
अपने घर का नम्बर मिटाया है
और गली के माथे पर लगा
गली का नाम हटाया है
और हर सड़क की
दिशा का नाम पोंछ दिया है
पर अगर आपको मुझे ज़रूर पाना है
तो हर देश के, हर शहर की,
हर गली का द्वार खटखटाओ
यह एक शाप है, यह एक वर है
और जहाँ भी
आज़ाद रूह की झलक पड़े
समझना वह मेरा घर है।
सुभद्रा कुमारी चौहान/ परिचय
क्या कहते हो कुछ लिख दूँ मैं
ललित-कलित कविताएं
चाहो तो चित्रित कर दूँ
जीवन की करुण कथाएं
सूना कवि-हृदय पड़ा है
इसमें साहित्य नहीं है
इस लुटे हुए जीवन में
अब तो लालित्य नहीं है
मेरे प्राणों का सौदा
करती अंतर की ज्वाला
बेसुध-सी करती जाती
क्षण-क्षण वियोग की हाला
नीरस-सा होता जाता
जाने क्यों मेरा जीवन
भूली-भूली सी फिरती
लेकर यह खोया-सा मन
कैसे जीवन की प्याली टूटी
मधु रहा न बाकी?
कैसे छुट गया अचानक
मेरा मतवाला साकी??
सुध में मेरे आते ही
मेरा छिप गया सुनहला सपना
खो गया कहाँ पर जाने?
जीवन का वैभव अपना
क्यों कहते हो लिखने को
पढ़ लो आँखों में सहृदय
मेरी सब मौन व्यथाएं
मेरी पीड़ा का परिचय
सुभद्रा कुमारी चौहान/ वेदना
दिन में प्रचंड रवि-किरणें
मुझको शीतल कर जातीं
पर मधुर ज्योत्स्ना तेरी
हे शशि! है मुझे जलाती
संध्या की सुमधुर बेला
सब विहग नीड़ में आते
मेरी आँखों के जीवन
बरबस मुझसे छिन जाते
नीरव निशि की गोदी में
बेसुध जगती जब होती
तारों से तुलना करते
मेरी आँखों के मोती
झंझा के उत्पातों सा
बढ़ता उन्माद हृदय का
सखि! कोई पता बता दे
मेरे भावुक सहृदय का
जब तिमिरावरण हटाकर
ऊषा की लाली आती
मैं तुहिन बिंदु सी उनके
स्वागत-पथ पर बिछ जाती
खिलते प्रसून दल, पक्षी
कलरव निनाद कर गाते
उनके आगम का मुझको
मीठा संदेश सुनाते
तुम्हें मालूम था
यह राह वहां नहीं निकलती
जहां पहुंचना है मैंने
तुम उस तरफ जा भी नहीं रहे थे
फिर भी तुम चलते रहे
मेरे साथ-साथ
ये राह तो समाप्त नहीं हो रही
हम दोनों प्रतीक्षा में हैं
मैं अपनी मंज़िल की
तुम मेरी राह की
जाओ तुम वापिस चले जाओ
मैं अपनी राह खुद ही ढूंढ़ लूंगी
राह न मिली तो बना लूंगी
मुझे राह बनानी आती है!
पद्मा सचदेव/ मेरे शहर की गूजरी
मन की निर्मल तन की उजरी
ये मेरे शहर की गूजरी
धूप की तरह ये ढल आती
साँसों की तरह ये चढ़ आती
ऊँचे-ऊँचे कठिन ये पर्वत
गूजरी के बर्तनों में भरा है
विधना द्वारा निकाला हुआ शर्बत
इसके क़दम-क़दम के बोझ से
ऊँचे पर्वत को सुख लगता
पैरों से ये दबा देती है
उसका कसा हुआ स्वस्थ बदन सा
कहीं-कहीं छलक जाते हैं दूध के बर्तन
घूँघरू इसके बटनों के छिड़ जाते तो लौ होती है
थककर इसका इसका मुँह कहता तो दिन चढ़ जाता
इस गूजरी ने कसे-कसाये तन के साथ
बर्तन यूँ सिर पर रखे हैं
जैसे नाग उठाए सिर पर धरती सारी
गेंद की तरह पहाड़ों से उतरती है गूजरी
घी में बसी हुई बालों की मींडीयाँ
हिल-हिलकर चौक रही हैं
तवी दरिया में पहुँच मुँह को मारे छट्टे
उपर उठाती मगजी वाली काली सुत्थन
तवी से बचती जाती है
दूध बेचकर भाव कर रही घुँघरुओं का
काले हरे कुंडलुओं का
निर्मला पुुतुल/ पुरुष से भिन्न एक स्त्री का एकांत
क्या तुम जानते हो
पुरुष से भिन्न
एक स्त्री का एकांत
घर-प्रेम और जाति से अलग
एक स्त्री को उसकी अपनी ज़मीन
के बारे में बता सकते हो तुम ।
बता सकते हो
सदियों से अपना घर तलाशती
एक बेचैन स्त्री को
उसके घर का पता ।
क्या तुम जानते हो
अपनी कल्पना में
किस तरह एक ही समय में
स्वंय को स्थापित और निर्वासित
करती है एक स्त्री ।
सपनों में भागती
एक स्त्री का पीछा करते
कभी देखा है तुमने उसे
रिश्तो के कुरुक्षेत्र में
अपने...आपसे लड़ते ।
तन के भूगोल से परे
एक स्त्री के
मन की गाँठे खोलकर
कभी पढ़ा है तुमने
उसके भीतर का खौलता इतिहास
पढ़ा है कभी
उसकी चुप्पी की दहलीज़ पर बैठ
शब्दो की प्रतीक्षा में उसके चेहरे को ।
उसके अंदर वंशबीज बोते
क्या तुमने कभी महसूसा है
उसकी फैलती जड़ो को अपने भीतर ।
क्या तुम जानते हो
एक स्त्री के समस्त रिश्ते का व्याकरण
बता सकते हो तुम
एक स्त्री को स्त्री-दृष्टि से देखते
उसके स्त्रीत्व की परिभाषा
अगर नहीं
तो फिर जानते क्या हो तुम
रसोई और बिस्तर के गणित से परे
एक स्त्री के बारे में....।
निर्मला पुतुल/ क्या हूँ मैं तुम्हारे लिए...?
क्या हूँ मैं तुम्हारे लिए...?
एक तकिया
कि कहीं से थका-मांदा आया और सिर टिका दिया
कोई खूँटी
कि ऊब, उदासी थकान से भरी कमीज़ उतारकर टाँग दी
या आँगन में तनी अरगनी
कि कपड़े लाद दिए
घर
कि सुबह निकला और शाम लौट आया
कोई डायरी
कि जब चाहा कुछ न कुछ लिख दिया
या ख़ामोशी-भरी दीवार
कि जब चाहा वहाँ कील ठोक दी
कोई गेंद
कि जब तब जैसे चाहा उछाल दी
या कोई चादर
कि जब जहाँ जैसे तैसे ओढ-बिछा ली
क्यूँ ? कहो, क्या हूँ मैं तुम्हारे लिए ?
साभार- कविताकोश
आगे पढ़ें
महादेवी वर्मा/ जब यह दीप थके तब आना
8 वर्ष पहले
कमेंट
कमेंट X