एकहि साधे सब सधे, सब साधे सब जाय,
दूध- दही- फल अन्न-जल, छोड़ पीजिए चाय।
छोड़ पीजिए चाय, अमृत बीसवीं सदी का,
जग-प्रसिद्ध जैसे गंगाजल गंग नदी का।
कहँ 'काका', इन उपदेशों का अर्थ जानिए,
बिना चाय के मानव-जीवन व्यर्थ मानिए।
कविता लिखने के लिए 'मूड' नहीं बन पाए,
एक सांस में पीजिए चार- पांच कप चाय।
चार- पांच कप चाय, अगर रह जाए अधूरी,
इतने ही लो, और हो गई कविता पूरी।
कहं 'काका' कवि, खंडकाव्य को पंद्रह प्याला,
पचपन कप में महाकाव्य हमने लिख डाला।
प्लेटफार्म पर यात्री, पानी को चिल्लाय,
पानी वाला है नहीं, चाय पियो जी चाय।
चाय पियो जी चाय, हिलाकर बोला दाढ़ी,
पैसे लेउ निकाल, छूट जाएगी गाड़ी।
'काका' पीकर चाय विरोधी दल का नेता,
धुआंधार व्याख्यान सभा-संसद में देता।
लक्ष्मण के शक्ति लगी, विकल हुए भगवान,
संजीवनी लेने गए, पवन - पुत्र हनुमान।
पवन - पुत्र हनुमान, आ गए लेकर बूटी,
सेवन करके लखनलाल की निद्रा टूटी।
कहं 'काका' कवि, जब खोली अक्क्ल की खत्ती,
समझ गए हम, इस चाय की थीं कुछ पत्ती।
आगे पढ़ें
चाय चक्रम
एक वर्ष पहले
कमेंट
कमेंट X