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‘कविता लिखना आसान है लेकिन गीत लिखना बहुत मुश्किल’ - नीरज

गोपाल दास नीरज
                
                                                         
                            गोपाल दास नीरज का फिल्मी सफ़र बेशक छोटा सा रहा हो, लेकिन वे आज भी चर्चित और सक्रिय कवियों में हैं। उन्होंने खूब लिखा और अब भी लगातार लिख रहे हैं। बेशक अब सेहत जवाब देती है, अक्सर बीमार रहते हैं, लेकिन उनके भीतर का कवि हमेशा की तरह आज भी जवान है। वे कहते हैं, ‘अगर सक्रिय न रहूं, लिखना पढ़ना बंद कर दूं, मंच पर न जाऊं तो एक दिन भी जी नहीं पाउंगा। इसी से मुझे ऊर्जा मिलती है।‘
                                                                 
                            

आज की नई पीढ़ी भले ही नीरज जी को न जाने, लेकिन उनके गीतों को आज भी गुनगुनाती जरूर है। चाहे वो मेरा नाम जोकर के गीत हों, गैम्बलर, प्रेम पुजारी या शर्मीली के गाने हों या फिर उनका सबसे पहला और लोकप्रिय गाना ‘कारवां गुजर गया, गुबार देखते रहे’…

करीब एक साल पहले अलीगढ़ के उनके घर गया था। तब प्रदेश में अखिलेश यादव की सरकार थी और नीरज जी को सरकारी गाड़ी के साथ उत्तर प्रदेश फिल्म विकास परिषद के मानद अध्यक्ष के तौर पर सरकार ने सम्मान दिया था, कैबिनेट मंत्री का दर्जा था। जाड़े की गुनगुनी धूप सेंकते हुए अपने घर के बरामदे में नीरज जी बातें करते हैं तो अतीत में चले जाते हैं और फिर एकदम से लौट कर मौजूदा दौर के लेखन से लेकर सियासत, समाज और रिश्तों की बात करने लगते हैं।

कविता तो वो है जो आपके हृदय को छुए

हर मुद्दे पर कहने के लिए उनके पास बहुत कुछ है। उनसे हुई लंबी बातचीत के कुछ हिस्से:

आज जिस तरह के गीत लिखे जा रहे हैं, आपको कैसे लगते हैं... कोई कवि और गीतकार जो आपको पसंद आता हो?

मैं आम तौर पर सुनता ही नहीं, फिल्में देखता नहीं। फिर भी मुझे लगता है कि प्रसून जोशी और कुमार विश्वास अच्छा लिख रहे हैं। गुलजार तो बढ़िया लिखते ही हैं। वैसे नाम गिनाना मुश्किल है। मेरे पास बहुत सी कविता की किताबें आती हैं, लेकिन उन्हें मैं देखता तक नहीं। कवि आज हजारों हो गए लेकिन इन्होंने कविता को अलोकप्रिय कर दिया। जब ये नहीं बिकते तो हमारे पास आते हैं।

कविता तो वो है जो आपके हृदय को छुए, आपके संस्कार को छुए... सिर्फ बौद्धिक व्यायाम से कविता नहीं बनती। ऐसी कविता वही लोग लिखते हैं, वही समझते हैं। हमलोग तो भाई कभी इतने विद्वान हुए नहीं। इस वजह से हमको तो लोगों ने कवि सम्मेलनों का कवि कह दिया लेकिन डिमांड हर जगह हमारी ही होती है।
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कविता तो वो है जो आपके हृदय को छुए

8 वर्ष पहले

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