संसार के कुछ रिश्ते हमें पहले से मिलते हैं और कुछ हम ख़ुद बनाते हैं। जो रिश्ते हम ख़ुद अपने लिए चुनते हैं उनमें दोस्ती का रिश्ता बेहद ख़ास है। ये भरोसे पर टिकता है, उसी के सहारे ही निभाया भी जाता है। शायरों ने भी दोस्तों के लिए बहुत कुछ कहा है उनकी दी मुहब्बत भी और दग़ा भी
दोस्ती आम है लेकिन ऐ दोस्त
दोस्त मिलता है बड़ी मुश्किल से
- हफ़ीज़ होशियारपुरी
दोस्त दो-चार निकलते हैं कहीं लाखों में
जितने होते हैं सिवा उतने ही कम होते हैं
- लाला माधव राम जौहर
दोस्ती ख़्वाब है और ख़्वाब की ता'बीर भी है
रिश्ता-ए-इश्क़ भी है याद की ज़ंजीर भी है
- अज्ञात
मुझे दोस्त कहने वाले ज़रा दोस्ती निभा दे
ये मुतालबा है हक़ का कोई इल्तिजा नहीं है
- शकील बदायुनी
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