आँगन में धूप न आए तो समझो
तुम किसी ग़ैर—इलाक़े में रहते हो
मिटटी में मेरे बदन की टूट फूट पड़ी है
हमारे ख़्वाबों में चाप कौन छोड़ जाता है
और आगे....
हमें मरने की मोहलत नहीं दी जाती
क्या ख्वाइश की मियान में
हमारे हौसले रखे हुए होते हैं..!
सारा शगुफ़्ता, एक मशहूर पाकिस्तानी शायरा थीं, सारा का परिवार बंटवारे के समय भारत के पंजाब से कराची जाकर बस गया था। यहीं पर सारा का जन्म 1954 में हुआ। सारा शगुफ़्ता वो शायरा हैं जो अपने तमाम गम और दर्द को ग़ज़ल, नज़्म में तब्दील कर देतीं थीं। सारा ने किशोरवय अवस्था में ही कविताएं लिखनी शरू कर दी थी। स्कूल के दिनों से ही उनके माता-पिता उन्हें एक घरेलू महिला बनाने की कोशिश करते रहे। लेकिन सारा के अंदर कविताएं पल रहीं थीं। सारा हमारे वक़्त की एक शायरा और एक इंसान का इक़बालिया बयान हैं, एक परेशान और न जाने किस तरह के प्रेम की तलाश में दर्दभरी ज़िंदगी का कुबूलनामा ही उनकी शायरी और नज़्में बन गईं।
पाकिस्तान की इस शायरा ने दोस्ती में कभी भी सरहदों को कोई बंधन नहीं माना। सारा की दोस्ती मशहूर लेखिका अमृता प्रीतम से थी। सारा का पत्राचार अमृता से चलता रहता था और कई बार उन पत्रों में शगुफ़्ता अपने जीवन का दर्द बयान करतीं। सारा के जीवन और जीवनी को करीब से देखने, जानने और महसूस करने वाली मशहूर लेखिका अमृता प्रीतम ने शगुफ्ता के शब्दों को दोहराते हुए लिखा है -
“ऐ खुदा, मैं बहुत कड़वी हूँ, पर तेरी शराब हूँ !’ और मैं उसकी नज़रों और उसके खत को पढ़ते-पढ़ते खुदा के शराब की बूँद-बूँद दूध पी रही हूँ।”
17 साल की उम्र में जब पहली बार उनकी शादी हुई तो उन्होंने अपनी माता-पिता के बताए रास्तों पर चलने की कोशिश की, यानी एक ज़िम्मेदार घरेलू महिला की भूमिका अपनाने का प्रयास। लेकिन उनके समझदार व्यक्तित्व और बौद्धिकता के चलते उनके पति उनसे नाराज़ रहने लगे।
मौत की तलाश मत लो
इंसान से पहले मौत ज़िंदा थी
टूटने वाले जमीन पर रह गए
मैं पेड़ से गिरा साया हूँ
आवाज़ से पहले घुट नहीं सकती
मेरी आंखों में कोई दिल मर गया है!
सारा के पति और सरपरस्त मर्द उसे हर बार सिर्फ इसलिए सज़ा देते रहे कि वह एक औरत थी और इसलिए भी कि वह शायरी करती थी। प्रेम की एक बेचैन तलाश में सारा ने चार विवाह किए और हर बार उन्हें अपमान और उत्पीड़न और क्रूरता का शिकार होना पड़ा। उनके पतियों में कुछ अच्छे-ख़ासे शायर भी थे, लेकिन वे भी मर्द ही साबित हुए और उन्हें भी सारा का शायरी करना गवारा नहीं हुआ। तमाम दुखों और यातनाओं को सहते हुए सारा ने आख़िरकार मौत की गोद में खुद को धकेल देने का निर्णय लिया लेकिन जो कुछ लिख गईं वह आने वाली पीढ़ियों के लिए को सोचने पर मजबूर करता है।
‘मेरे क़बीले की कोख से
जब सिर्फ़ चीख़ पैदा हुई
तो मैंने बच्चे को गोद से फेंक दिया
और चीख़ को गोद ले लिया’
सारा की कविताओं और नज़्मों में ज़्यादातर स्त्री उत्पीड़न से वास्ता रखती हैं लेकिन भावनात्मक रूप से अशांत और निपट व्यक्तिवाद के दौर से गुजर रहे पाकिस्तान में एक समय सारा राजनीतिक रूप से सक्रिय भी रहीं और 1980 में उन्हें उस समय गिरफ़्तार भी किया गया जब पाकिस्तान में सैन्य शासन द्वारा पत्रकारों, विरोधियों, कवियों और बुद्धिजीवियों का उत्पीड़न हो रहा था।
तुम दुख को पैवन्द करना
मेरे पास उधार ज़्यादा है और दुकान कम
आँखें दो जुड़वाँ बहनें
एक मेरे घर बियाही गई दूसरी तेरे घर
हाथ दौ सौतले भाई
सारा का चौथा विवाह भी टूट गया जिसके बाद वे बुरी तरह टूट चुकी थीं। कई बार खुदकुशी की नाकाम कोशिश के बाद सारा ने पांचवी और आख़िरी कोशिश के बारे में लिखा, ''मेरे पैरों तले की ज़मीन चुरा ली गई थी और मेरे बदन को ही मेरा वतन क़रार दे दिया गया था, ये कब तक क़बूल करती रहती? इंसानों के दाग़ धोते-धोते मेरे तो हाथ काले पड़ चुके थे। उदासी का एक अथाह समन्दर मेरी छोटी सी कश्ती में हरदम सवार रहता। ख़ुदा तो चांद की स्याही से रात लिखता है, लेकिन ख़ुदा के बंदों ने रात की स्याही से मेरे दिन लिख दिए थे। दुनिया की बेज़मीरी मेरा बदन चाट चुकी थी। बस एक रूह थी, जिसे मैंने मस्जिद की ईंट की तरह बचा रखा था। कहते हैं, बदन में बहुत दिन क़ैद रही तो रूह में ज़ंग लग जाता है, सो चार जून 1984 की उस रात मैंने कर बिस्मिल्लाह खोल दी गांठ" और इस तरह एक युवा और बागी शायरा का दुखद अंत हुआ। लेकिन सारा अपनी लेखनी में हमेशा ज़िंदा रहेंगी। अपनी पांचवीं और आख़िरी खुदकुशी को सारा जिस तरह बताती है, वह मंज़र एक तीर की तरह दिल में ध्ंस जाता है -
हमारे आँसुओं की आँखें बनाई गईं
हम ने अपने अपने तलातुम से रस्सा-कशी की
और अपना अपना बैन हुए
सितारों की पुकार आसमान से ज़्यादा ज़मीन सुनती है
मैं ने मौत के बाल खोले
और झूट पे दराज़ हुई
नींद आँखों के कंचे खेलती रही
शाम दोग़्ले-रंग सहती रही
आसमानों पे मेरा चाँद क़र्ज़ है
मैं मौत के हाथ में एक चराग़ हूँ
जनम के पहिए पर मौत की रथ देख रही हूँ
ज़मीनों में मेरा इंसान दफ़्न है
सज्दों से सर उठा लो
मौत मेरी गोद में एक बच्चा छोड़ गई है।
जब हमारे गुनाहों पे वक़्त उतरेगा
बंदे खरे हो जाएँगे
फिर हम तौबा के टाँकों से
ख़ुदा का लिबास सिएँगे
तुम ने समुंदर रहन रख छोड़ा
और घोंसलों से चुराया हुआ सोना
बच्चे के पहले दिन पे मल दिया गया
आगे पढ़ें
आँखें दो जुड़वाँ बहनें
8 वर्ष पहले
कमेंट
कमेंट X