कर्नाटक में हालिया संपन्न चुनाव का परिणाम स्पष्ट रूप से किसी के पक्ष में नहीं रहा। सियासी पारा भी चढ़ने लगा है। इस बीच जम्हूरियत पर बहस तेज हो गई है। लोकतंत्र को शआयरों ने अपने नजरिए से देखा है। इसलिए शेरों-शायरी की श्रृंखला में आज हम पाठकों के लिए पेश कर रहे हैं जम्हूरियत पर शायरों के अशआर-
जम्हूरियत इक तर्ज़-ए-हुकूमत है कि जिसमें
बंदों को गिना करते हैं, तौला नहीं करते
-अल्लामा इक़बाल
तो उससे कह दो कि वो आए देख ले आकर
लगाया हमने था जम्हूरियत का जो पौधा
-जावेद अख़्तर
नए किरदार आते जा रहे हैं
मगर नाटक पुराना चल रहा है
- राहत इंदौरी
मुझ से क्या बात लिखानी है
मुझ से क्या बात लिखानी है कि अब मेरे लिए
कभी सोने कभी चांदी के क़लम आते हैं
-बशीर बद्र
दुहाई दे के वो जम्हूरियत की
निज़ाम-ए-ख़्वाब रुस्वा कर रहा है
-मोहम्मद अज़हर शम्स
फिर इस मज़ाक़ को जम्हूरियत का नाम दिया
हमें डराने लगे वो हमारी ताक़त से
-नोमान शौक़
हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी
जिस को भी देखना हो कई बार देखना
-निदा फ़ाज़ली
पड़ता है सर लोगों के क़दमों में....
जम्हूरियत के बीच फंसी अक़्लियत था दिल
मौक़ा जिसे जिधर से मिला वार कर दिया
-नोमान शौक़
झुकाना सीखना पड़ता है सर लोगों के क़दमों में
यूं ही जम्हूरियत में हाथ सरदारी नहीं आती
- अज्ञात
जम्हूरियत इक तर्ज़-ए-हुकूमत है कि जिसमें
घोड़ों की तरह बिकते हैं इंसान वग़ैरा
- अज्ञात
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वो आए देख ले आकर
8 वर्ष पहले
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