भँवर से लड़ो तुंद लहरों से उलझो
कहाँ तक चलोगे किनारे किनारे
- शकील बदायुनी
चले चलिए कि चलना ही दलील-ए-कामरानी है
जो थक कर बैठ जाते हैं वो मंज़िल पा नहीं सकते
- हफ़ीज़ बनारसी
ज़रा दरिया की तह तक तो पहुँच जाने की हिम्मत कर
तो फिर ऐ डूबने वाले किनारा ही किनारा है
- माहिर-उल क़ादरी
अभी से पाँव के छाले न देखो
अभी यारो सफ़र की इब्तिदा है
- एजाज़ रहमानी
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इब्तिदा
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