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आज का शब्द - शूल और गोपालदास 'नीरज' की कविता - स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से

Aaj ka Shabd Shool
                
                                                         
                            अपने विचारों, भावनाओं और संवेदनाओं को व्यक्त करने का सबसे सशक्त माध्यम मातृभाषा है। इसी के जरिये हम अपनी बात को सहजता और सुगमता से दूसरों तक पहुंचा पाते हैं। हिंदी की लोकप्रियता और पाठकों से उसके दिली रिश्तों को देखते हुए उसके प्रचार-प्रसार के लिए अमर उजाला ने ‘हिंदी हैं हम’ अभियान की शुरुआत की है। इस कड़ी में साहित्यकारों के लेखकीय अवदानों को अमर उजाला और अमर उजाला काव्य हिंदी हैं हम श्रृंखला के तहत पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास कर रहा है। हिंदी हैं हम शब्द श्रृंखला में आज का शब्द है - शूल, जिसका अर्थ है- 1. एक प्रकार का प्राचीन अस्त्र जो बरछे की तरह का होता है; भाला; त्रिशूल 2. प्राचीन काल में मृत्युदंड देने का एक औज़ार; सूली 3. लोहे का लंबा नुकीला काँटा 4. पेट में वायु से होने वाला ज़ोर का दर्द 5. चुभने या कष्ट देने वाली बात 6. नुकीला सिरा; नोक 7. बाधा। प्रस्तुत है गोपालदास 'नीरज' की कविता - स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से
                                                                 
                            


स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से

स्वप्न झरे फूल से, मीत चुभे शूल से
लुट गये सिंगार सभी बाग़ के बबूल से
और हम खड़े-खड़े बहार देखते रहे।
कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे।
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5 वर्ष पहले

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