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 आज का शब्द- 'सांकल' और रवीन्द्रनाथ टैगोर की कविता: झर झर झर जल झरता है

आज का शब्द- 'सांकल'  और रवीन्द्रनाथ टैगोर की कविता: झर झर झर जल झरता है
                
                                                         
                            अपने विचारों, भावनाओं और संवेदनाओं को व्यक्त करने का सबसे सशक्त माध्यम मातृभाषा है। इसी के जरिये हम अपनी बात को सहजता और सुगमता से दूसरों तक पहुंचा पाते हैं। हिंदी की लोकप्रियता और पाठकों से उसके दिली रिश्तों को देखते हुए उसके प्रचार-प्रसार के लिए अमर उजाला ने ‘हिंदी हैं हम’ अभियान की शुरुआत की है। इस कड़ी में साहित्यकारों के लेखकीय अवदानों को अमर उजाला और अमर उजाला काव्य हिंदी हैं हम श्रृंखला के तहत पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास कर रहा है। हिंदी हैं हम शब्द श्रृंखला में आज का शब्द है- सांकल, जिसका अर्थ है- सिटकनी, जंजीर या दरवाजे की कुंडी। 
                                                                 
                            

प्रस्तुत है गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की कविता- 

झर झर झर जल झरता है, आज बादरों से 
आकुल धारा फूट पड़ी है नभ के द्वारों से ।।

आज रही झकझोर शाल-वन आंधी की चमकार 
आंका-बांका दौड़ रहा जल, घेर रहा विस्तार ।।

आज मेघ की जटा उड़ाकर नाच रहा है कौन 
दौड़ रहा है मन बूंदों-बूंदों अंधड़ का सह भार 
किसके चरणों पर जा गिरता ले अपना आभार ।।

द्वारों की #सांकल टूटी है, अंतर में है शोर,
पागल मनुवा जाग उठा है, भादों में घनघोर 
भीतर-बाहर आज उठाई,किसने यह हिल्लोर ।।
5 वर्ष पहले

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