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आज का शब्द- नीलांबर और मैथिलीशरण गुप्त की कविता: मातृभूमि

आज का शब्द- नीलांबर और मैथिलीशरण गुप्त की कविता: मातृभूमि
                
                                                         
                            अपने विचारों, भावनाओं और संवेदनाओं को व्यक्त करने का सबसे सशक्त माध्यम मातृभाषा है। इसी के जरिये हम अपनी बात को सहजता और सुगमता से दूसरों तक पहुंचा पाते हैं। हिंदी की लोकप्रियता और पाठकों से उसके दिली रिश्तों को देखते हुए उसके प्रचार-प्रसार के लिए अमर उजाला ने ‘हिंदी हैं हम’अभियान की शुरुआत की है। इस कड़ी में साहित्यकारों के लेखकीय अवदानों को अमर उजाला और अमर उजाला काव्य हिंदी हैं हम श्रृंखला के तहत पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास कर रहा है। हिंदी हैं हम शब्द श्रृंखला में आज का शब्द है- नीलांबर, जिसका अर्थ है-1. नीला कपड़ा या वस्त्र 2. शनैश्चर; शनि ग्रह 3. बलदेव, जिसका वस्त्र नीला हो। प्रस्तुत है मैथिलीशरण गुप्त की कविता: मातृभूमि....
                                                                 
                            

नीलांबर परिधान हरित तट पर सुन्दर है
सूर्य-चन्द्र युग मुकुट, मेखला रत्नाकर है॥

नदियां प्रेम प्रवाह, फूल तारे मंडन हैं
बंदीजन खग-वृन्द, शेषफन सिंहासन है॥

करते अभिषेक पयोद हैं, बलिहारी इस वेष की
हे मातृभूमि ! तू सत्य ही, सगुण मूर्ति सर्वेश की॥

जिसके रज में लोट-लोट कर बड़े हुए हैं
घुटनों के बल सरक-सरक कर खड़े हुए हैं॥

परमहंस सम बाल्यकाल में सब सुख पाये
जिसके कारण धूल भरे हीरे कहलाये॥

हम खेले-कूदे हर्षयुत, जिसकी प्यारी गोद में
हे मातृभूमि ! तुझको निरख, मग्न क्यों न हों मोद में?

पा कर तुझसे सभी सुखों को हमने भोगा
तेरा प्रत्युपकार कभी क्या हमसे होगा?
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5 वर्ष पहले

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