पर्वत न हुआ, निर्झर न हुआ,
सरिता न हुआ, सागर न हुआ,
क़िस्मत ऐसी लेकर आया
जंगल न हुआ, पांतर न हुआ।
जब-जब नीले नभ के नीचे
उजले ये सारस के जोड़े,
जल बीच खड़े खुजलाते हैं
पाँखें अपनी गर्दन मोड़े,
तब-तब आकुल हो उठता मन,
कितना अभिशप्त मिला जीवन!
जलचर न हुआ, जलखर न हुआ,
पुरइन न हुआ, पोखर न हुआ।
जब-जब साखू बन में उठते
करमा की धुन के हिलकोरे,
मादल की थापों के सम पर
भाँवर देते आँचल कोरे,
आगे पढ़ें
कमेंट
कमेंट X