आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

Hindi Kavita: शंभुनाथ सिंह की रचना- जब-जब झोंपड़ियों की बस्ती बनती है सावन की रानी

कविता
                
                                                         
                            पर्वत न हुआ, निर्झर न हुआ, 
                                                                 
                            
सरिता न हुआ, सागर न हुआ, 
क़िस्मत ऐसी लेकर आया 
जंगल न हुआ, पांतर न हुआ। 

जब-जब नीले नभ के नीचे 
उजले ये सारस के जोड़े, 
जल बीच खड़े खुजलाते हैं 
पाँखें अपनी गर्दन मोड़े, 

तब-तब आकुल हो उठता मन, 
कितना अभिशप्त मिला जीवन! 
जलचर न हुआ, जलखर न हुआ, 
पुरइन न हुआ, पोखर न हुआ। 

जब-जब साखू बन में उठते 
करमा की धुन के हिलकोरे, 
मादल की थापों के सम पर 
भाँवर देते आँचल कोरे,  आगे पढ़ें

2 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर