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संजय सिंघई की कविता- जेठ की दोपहरी में

कविता
                
                                                         
                            जेठ की दोपहरी में,
                                                                 
                            
खस की चिक लगे कमरे में,
समानांतर ,पैरों को सिकोड़े,
वात्सल्यमय,
पुत्र-पत्नी को सोते ,
देखकर,
सूरज की तपन गल गई,
हवाएँ जो रेगिस्तानी गर्म थीं,
कलेजे को शीतल कर गईं।

बाद के कमरे से पिता ने कहा,
बेटा थोड़ा आराम भी करो,
आज सूरज तो मानो आग उगल रहा है,
लू की कुल्हाड़ी चल रही है,
चिक पर पानी सींचते, मां को देखकर,
आँखें सावन-भादों सी हुई,
जेठ की दोपहरी 
मानो,
पौष की
सर्द रात सी महसूस हुई।
3 वर्ष पहले

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