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Rang Panchami 2022: हेमंत देवलेकर की कविता- गलियों में बेतहाशा मची हुई है रंगपंचमी

कविता
                
                                                         
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कलर बॉक्स से ऊबकर
भागे हुए रंग
चित्रकार की
मर्ज़ी पूछे बिना
ख़ुद ही फैल जाना चाहते हैं
पानी के कैनवास पर

लहरों के 
सजे-सँवरे सुंदर चेहरे,
उनकी थिरकती देह 
और उनके लोकगीत
बन गए हैं रंग
जो अब कलर बॉक्स में
ढूंढ़ने पर भी नहीं मिलने वाले

दो

उड़ती हुई पतंगों के
प्रतिबिंब थे
पानी की सतह पर तैरते हुए
जो अपनी-अपनी
डोर तुड़ाकर
गोते लगा गए हैं
पानी में गहरे
और भाग रहे हैं छूने
रोम-रोम पानी का
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4 वर्ष पहले

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