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Ramdhari Singh Dinkar Poetry: तान, तान, फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ

कविता
                
                                                         
                            झूमें झर चरण के नीचे मैं उमंग में गाऊँ
                                                                 
                            
तान, तान, फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ।

यह बाँसुरी बजी माया के मुकुलित आकुंचन में,
यह बाँसुरी बजी अविनाशी के संदेह गहन में
अस्तित्वों के अनस्तित्व में, महाशांति के तल में,
यह बाँसुरी बजी शून्यासन की समाधि निश्चल में।

कम्पहीन तेरे समुद्र में जीवन-लहर उठाऊँ
तान, तान,फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ।

अक्षयवट पर बजी बाँसुरी,गगन मगन लहराया
दल पर विधि को लिए जलधि में नाभि-कमल उग आया
जन्मी नव चेतना, सिहरने लगे तत्व चल-दल से,
स्वर का ले अवलम्ब भूमि निकली प्लावन के जल से।

अपने आर्द्र वसन की वसुधा को फिर याद दिलाऊँ
तान, तान, फण व्याल! कि तुझ पर मैं बाँसुरी बजाऊँ। आगे पढ़ें

2 वर्ष पहले

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