हमारी भक्ति से अधिक
समर्पण है - भक्ति
शब्द में।
हमसे कहां छूट पाता है -
माया का मोह
भक्ति की दुर्लभ
साधना के क्षणों में।
प्रेम शब्द पूर्ण हैं -
ईश्वरीय दिव्यता से।
हमारे प्रेम में
बनी रहती है
मनुष्य होने की
सारी दुर्बलताएं ।
प्रकृति शब्द में
समाई है पृथ्वी
और उसका सृजन।
हमारी प्रकृति में
मनुष्य होने पर भी
नहीं बचा है मनुष्यत्व।
स्त्री शब्द में
शेष है विश्व - स्त्री - अस्मिता
उसका प्रेम, ममत्व और
और त्याग।
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