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Hindi Poetry: पुष्पिता अवस्थी की कविता- बड़ी कुशलता से हम छीनने में लगे हैं सर्वस्व

कविता
                
                                                         
                            हमारी भक्ति से अधिक
                                                                 
                            
समर्पण है - भक्ति 
शब्द में।

हमसे कहां छूट पाता है - 
माया का मोह
भक्ति की दुर्लभ
साधना के क्षणों में।

प्रेम शब्द पूर्ण हैं - 
ईश्वरीय दिव्यता से।

हमारे प्रेम में
बनी रहती है 
मनुष्य होने की
सारी दुर्बलताएं ।

प्रकृति शब्द में
समाई है पृथ्वी
और उसका सृजन।

हमारी प्रकृति में
मनुष्य होने पर भी
नहीं बचा है मनुष्यत्व।

स्त्री शब्द में
शेष है विश्व - स्त्री - अस्मिता 
उसका प्रेम, ममत्व और
और त्याग।
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2 वर्ष पहले

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