प्यासी नदी
रेत पर तड़पे, अब तो बादल आ,
घिरी झुलसती लू में बहना,
कैसे घर आए?
भैया के हल बैल हाँफते,
सिर भी चकराए।
मुँह उचकाए
बछिया टेरे, अब तो बादल आ।
घट-घट पनघट, पोखर प्यासे
झुलस रहा मैदान,
कर्फ्यू-सा फैला सन्नाटा,
सड़के हैं सुनसान।
गौरैया के पंख
पुकारे, अब तो बादल आ।
आगे पढ़ें
कमेंट
कमेंट X