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नामवर सिंह की कविता- दोस्त, देखते हो जो तुम

namvar singh
                
                                                         
                            दोस्त, देखते हो जो तुम अंतर्विरोध-सा
                                                                 
                            
मेरी कविता कविता में, वह दृष्टि दोष है ।
यहाँ एक ही सत्य सहस्र शब्दों में विकसा
रूप रूप में ढला एक ही नाम, तोष है।
 

एक बार जो लगी आग, है वही तो हँसी
कभी, कभी आँसू, ललकार कभी, बस चुप्पी ।
मुझे नहीं चिंता वह केवल निजी या किसी
जन समूह की है, जब सागर में है कुप्पी

 
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3 वर्ष पहले

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