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महादेवी वर्मा की कविता: इन आँखों ने देखी न राह कहीं

महादेवी वर्मा
                
                                                         
                            इन आँखों ने देखी न राह कहीं 
                                                                 
                            
इन्हें धो गया नेह का नीर नहीं, 
करती मिट जाने की साध कभी, 
इन प्राणों को मूक अधीर नहीं, 
अलि छोड़ो न जीवन की तरणी, 
उस सागर में जहाँ तीर नहीं! 
कभी देखा नहीं वह देश जहाँ, 
प्रिय से कम मादक पीर नहीं! 

जिसको मरुभूमि समुद्र हुआ 
उस मेघव्रती की प्रतीति नहीं, 
जो हुआ जल दीपकमय उससे 
कभी पूछी निबाह की रीति नहीं, 
मतवाले चकोर ने सीखी कभी; 
उस प्रेम के राज्य की नीति नहीं, 
तूं अकिंचन भिक्षुक है मधु का, 
अलि तृप्ति कहाँ जब प्रीति नहीं! 
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5 वर्ष पहले

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