कभी-कभी खुद से बात करो, कभी ख़ुद से बोलो।
अपनी नज़र में तुम क्या हो? ये मन की तराजू पर तोलो।
कभी-कभी ख़ुद से बात करो।
कभी-कभी ख़ुद से बोलो।
हरदम तुम बैठे ना रहो-शौहरत की इमारत में।
कभी-कभी ख़ुद को पेश करो आत्मा की अदालत में।
केवल अपनी कीर्ति न देखो- कमियों को भी टटोलो।
कभी-कभी ख़ुद से बात करो।
कभी-कभी ख़ुद से बोलो।
दुनिया कहती कीर्ति कमा के, तुम हो बड़े सुखी।
मगर तुम्हारे आडम्बर से, हम हैं बड़े दु:खी।
कभी तो अपने श्रव्य-भवन की बंद खिड़कियां खोलो।
कभी-कभी ख़ुद से बात करो।
कभी-कभी ख़ुद से बोलो।
ओ नभ में उड़ने वालो, जरा धरती पर आओ।
अपनी पुरानी सरल-सादगी फिर से अपनाओ।
तुम संतो की तपोभूमि पर मत अभिमान में डालो।
अपनी नजर में तुम क्या हो? ये मन की तराजू में तोलो।
कभी-कभी ख़ुद से बात करो।
कभी-कभी ख़ुद से बोलो।
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