आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

ज्योति शोभा की कविता: प्रेमी और नागरिक के अज्ञातवास में

कविता
                
                                                         
                            लौट रहे हैं पाखी 
                                                                 
                            
साँझ गिर रही है 
जैसे करुणा ही बाक़ी है संसार में 
और थोड़ी उन्मत्तता बाक़ी है 

ऐसे में कोई कितना बाँध सकता है अपनी छाया 
कितना स्वाँग कर सकता है विस्मृति का 

प्रेमी और नागरिक के अज्ञातवास में कोई नहीं आता किवाड़ पीटने 

साँझ आती है दबे पाँव 
निकट ही बैठ कर कालिमा का निस्पंद राग गुनगुनाती है 

याद आता रहता है 
मल्लाह जैसा कोई मनुष्य छोड़ गया था नदी पार करा के 
रुका नहीं था 
पीछे जल हुआ जाता था रक्त 
पीछे उफान खाती थी देह की मेघमालाएँ 
बिंब सारे धुँधलाते थे 

ऐसे में 
कोई दिलवाता है प्रेयसी को दर्पण-कंघी 
कोई मंथर उतरता है जल में 
कोई गाढ़ी शास्त्रीय धुन छेड़ता है घाट पर 
याद आता जाता है 
मरणोपरांत 
इसी तरह साधी जाती है सद्यःस्नात देह 
इसी तरह साधा जा रहा है देश। 
4 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर