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Jaishankar Prasad Poetry: निश्छल प्रेम-कथा कहती हो

कविता
                
                                                         
                            ले चल वहाँ भुलावा देकर, मेरे नाविक! धीरे-धीरे। 
                                                                 
                            

जिस निर्जन में सागर लहरी, अंबर के कानों में गहरी— 
निश्छल प्रेम-कथा कहती हो, तज कोलाहल की अवनी रे! 

जहाँ साँझ-सी जीवन-छाया ढीले अपनी कोमल काया, 
नील नयन से ढुलकाती हो, ताराओं की पाँति घनी रे! 

जिस गंभीर मधुर छाया में—विश्व चित्र-पट चल माया में— 
विभुता विभु-सी पड़े दिखाई दुख-सुख वाली, सत्य बनी रे! 

श्रम-विश्राम क्षितिज बेला से—जहाँ सृजन करते मेला से, 
अमर जागरण उषा नयन से—बिखराती हो ज्योति घनी रे! 
2 वर्ष पहले

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