आज़ादी का पर्व, उचित है आज सगर्व मनाएँ हम।
भवन-भवन पर ध्वज लहरा कर गीत विजय के गाएँ हम॥
दीप जलाएँ, नैन मिलाएँ नभ के चाँद-सितरों से।
गूँज उठे धरती का कोना-कोना जय-जयकारों से॥
क्यों न हर्ष हो, जब खोया उत्कर्ष हमें फिर प्राप्त हुआ।
भगी दासता दूर, देश का सुयश विश्व में व्याप्त हुआ॥
पर केवल इससे करना होगा हमको सन्तोष नहीं।
तड़प रहे अरमान अभी हम रह सकते ख़ामोश नहीं॥
देख चमकता सूर्य गगन में, मन में अति उल्लास हुआ।
किन्तु धरा के प्रांगण में है अभी न पूर्ण प्रकाश हुआ॥
हुआ शुभागम हे बसन्त का, पर आ सकी बहार नहीं।
शुष्क लताओं में मधुरस का हुआ अभी संचार नहीं॥
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