कहने को जनता की
कितनी मुँहबोली है,
सुख-दुख में शामिल है
सबकी हमजोली है,
कामकाज में लेकिन रत्ती-भर धमक है,
हिन्दी के चेहरे पर चान्दी की चमक है ।
ऊँचे आदर्शों के सपनों में खोई है,
किये रतजगे कितनी रात नहीं सोई है,
आज़ादी की खातिर बलिदानी वीरों की,
यादों में यह कितनी घुट-घुट कर रोई है ।
यों तो यह भोली है,
युग की रणभेरी है ।
लेकिन अँग्रेज़ी की
भृत्या है...चेरी है ।
हाथों में संविधान, फिर भी है तुच्छ मान,
आँखों में लेकिन पटरानी-सी ललक है,
हिन्दी के चेहरे पर चान्दी की चमक है ।
कितने ईनाम और कितने प्रोत्साहन हैं,
फिर भी मुखमंडल पर कोरे आश्वासन हैं ।
जेबों में सोने के सिक्कों की आमद है,
फाइल पर हिन्दी की सिर्फ़ हिनहिनाहट है ।
बैठक में चर्चा है
'दो...जो भी देना है,
महामहिम के हाथो
पुरस्कार लेना है ।’
कितना कुछ निष्प्रभ है, समारोह लकदक है,
शील्ड लिए हाथों में क्या शाही लचक है !
हिन्दी के चेहरे पर चान्दी की चमक है ।
इत्रों के फाहे हैं, टाई की चकमक है
हिन्दी की देहरी पर हिंग्लिश की दस्तक है ।
ऊँची दूकानों के फीके पकवान हैं,
बॉस मगर हिन्दी के परम ज्ञानवान हैं ।
शाल औ दुशाला है
पान औ मसाला है,
उबा रहे भाषण हैं
यही कार्यशाला है ।
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