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Gorakh Pandey Poetry: हवा का रुख़ कैसा है, हम समझते हैं

कविता
                
                                                         
                            हवा का रुख़ कैसा है, हम समझते हैं 
                                                                 
                            
हम उसे पीठ क्यों दे देते हैं, हम समझते हैं 
हम समझते हैं ख़ून का मतलब 
पैसे की क़ीमत हम समझते हैं 
क्या है पक्ष में विपक्ष में क्या है, हम समझते हैं 
हम इतना समझते हैं 
कि समझने से डरते हैं और चुप रहते हैं 

चुप्पी का मतलब भी हम समझते हैं 
बोलते हैं तो सोच-समझकर बोलते हैं हम 
हम बोलने की आज़ादी का 
मतलब समझते हैं 
टटपुँजिया नौकरियों के लिए 
आज़ादी बेचने का मतलब हम समझते हैं 
मगर हम क्या कर सकते हैं 
अगर बेरोज़गारी अन्याय से 
तेज़ दर से बढ़ रही हो 
हम आज़ादी और बेरोज़गारी दोनों के 
ख़तरे समझते हैं 
हम ख़तरों से बाल-बाल बच जाते हैं 
हम समझते हैं 
हम क्यों बच जाते हैं, यह भी हम समझते हैं  आगे पढ़ें

2 वर्ष पहले

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