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Gopaldas Neeraj Poetry: आज की रात बड़ी शोख़ बड़ी नटखट है

कविता
                
                                                         
                            आज की रात बड़ी शोख़ बड़ी नटखट है 
                                                                 
                            
आज तो तेरे बिना नींद नहीं आएगी 
आज तो तेरे ही आने का यहाँ मौसम है 
आज तबियत न ख़यालों से बहल पाएगी। 

देख! वह छत पै उतर आई है सावन की घटा 
खेल खिलाड़ी से रही आँख मिचौनी बिजली 
दर पै हाथों में लिए बाँसुरी बैठी है बाहर 
और गाती है कहीं कोई कुयलिया कजली। 

पीऊ पपीहे की, यह पुरवाई, यह बादल की गरज 
ऐसे नस-नस में तेरी चाह जगा जाती है 
जैसे पिंजरे में छटपटाते हुए पंछी को 
अपनी आज़ाद उड़ानों की याद आती है। 

जगमगाते हुए जुगनू—यह दिए आवारा 
इस तरह रोते हुए नीम पै जल उठते हैं 
जैसे बरसों से बुझी सूनी पड़ी आँखों में 
ढीठ बचपन के कभी स्वप्न मचल उठते हैं। 

और रिमझिम ये गुनहगार, यह पानी की फुहार 
यूँ किए देती है गुमराह, वियोगी मन को 
ज्यूँ किसी फूल की गोदी में पड़ी ओस की बूँद 
जूठा कर देती है भौंरों के झुके चुंबन को। 
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2 वर्ष पहले

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