पुकारो मुझको कहीं से
बहुत जीवन से भरे लोगों
पुकारो नाम लेकर
खींच लो बाहर पकड़ कर हाथ।
अजब डर की खोह में
भीतर बहुत भीतर कहीं
मैं झर रहा हूँ धूल में अपनी
उबारो।
मुझे भी बोलने का सुख
हवा में डोलने का सुख
आत्मा के द्वार पूरे खोलने का सुख
मुझे भी चाहिए
कुछ काम
वर्षा में निरंतर भीगते जाना
कहीं आना कहीं जाना।
निकालो बाहर
अभी इस बंद पारावार में
हर तरफ़ से पंजे बढ़ाती मौत
मुझको घेरती ही घेरती जाती
खुले में
जगत का झूला
नहीं मैंने कभी झूला
फिरूँ मैं स्वयं को भूला
बिखरकर फैल जाना है।
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