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बंसल बेबाक की 3 चुनिंदा कविताएं

कविता
                
                                                         
                            आत्मा की निरन्तरता - नश्वर शरीर
                                                                 
                            

साँसें हो रही हैं कम,
नयन भी हो गये हैं नम,
जिन्दगी रह गयी है चन्द,
फिर किस बात का है घमण्ड,
साँसें हो रही......

फिर क्यों है हेरा फेरी,
तीन-पाँच, तेरा-मेरी,
क्यों करते हो प्रपंच,
अभी भी मन में है द्वन्द,
साँसें हो रही.....

यह कैसा अनर्गल विचार,
परिजनों को भी है आराम,
धन, मान, सम्मान है,
फिर भी क्यों हो परेशान।
साँसें हो रही.....

दम निकल रहा है,
ये प्रभु की नियामत है,
अभी भी कुछ वक्त है बाकी,
सुकर्म कर परहित, जनहित में,
कल्याण होगा तेरा,
फिर मिले या न मिले,
ये जीवन दोबारा।
साँसें हो रही..... आगे पढ़ें

उनकी यादें

2 वर्ष पहले

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