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अटल बिहारी वाजपेयी की कविता- अपने ही मन से कुछ बोलें

Atal Bihari Vajpayee
                
                                                         
                            क्या खोया, क्या पाया जग में
                                                                 
                            
मिलते और बिछुड़ते मग में
मुझे किसी से नहीं शिकायत
यद्यपि छला गया पग-पग में
एक दृष्टि बीती पर डालें, यादों की पोटली टटोलें!
 

पृथ्वी लाखों वर्ष पुरानी
जीवन एक अनन्त कहानी
पर तन की अपनी सीमाएँ
यद्यपि सौ शरदों की वाणी
इतना काफ़ी है अंतिम दस्तक पर, खुद दरवाज़ा खोलें!
 
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3 वर्ष पहले

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