दूर कहीं कोई रोता है
तन पर पहरा, भटक रहा मन,
साथी है केवल सूनापन,
बिछुड़ गया क्या स्वजन किसी का,
क्रंदन सदा करुण होता है।
जन्म दिवस पर हम इठलाते,
क्यों न मरण-त्यौहार मनाते,
अंतिम यात्रा के अवसर पर,
आँसू का अशकुन होता है।
अंतर रोएँ, आँख न रोएँ,
धुल जाएँगे स्वप्न सँजोए,
छलना भरे विश्व में,
केवल सपना ही सच होता है।
इस जीवन से मृत्यु भली है,
आतंकित जब गली-गली है,
मैं भी रोता आस-पास जब,
कोई कहीं नहीं होता है।
दूर कहीं कोई रोता है।
चौराहे पर लुटता चीर,
प्यादे से पिट गया वज़ीर,
चलूँ आख़िरी चाल कि बाज़ी छोड़ विरक्ति रचाऊँ मैं?
राह कौन-सी जाऊँ मैं?
सपना जन्मा और मर गया,
मधु ऋतु में ही बाग़ झर गया,
तिनके टूटे हुए बटोरूँ या नवसृष्टि सजाऊँ मैं?
राह कौन-सी जाऊँ मैं?
दो दिन मिले उधार में
घाटों के व्यापार में
क्षण-क्षण का हिसाब लूँ या निधि शेष लुटाऊँ मैं?
राह कौन-सी जाऊँ मैं?
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राह कौन-सी जाऊँ मैं?
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