आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अशोक वाजपेयी: यह ठहरा हुआ निर्जन समय, जिसमें पक्षी और चिड़ियाँ तक चुप हैं

अशोक वाजपेयी: यह ठहरा हुआ निर्जन समय, जिसमें पक्षी और चिड़ियाँ तक चुप हैं
                
                                                         
                            यह ठहरा हुआ निर्जन समय 
                                                                 
                            
जिसमें पक्षी और चिड़ियाँ तक चुप हैं, 
जिसमें रोज़मर्रा की आवाज़ें नहीं सिर्फ़ गूँजें भर हैं, 
जिसमें प्रार्थना, पुकार और विलाप सब मौन में बिला गए हैं, 
जिसमें संग-साथ कहीं दुबका हुआ है, 
जिसमें हर कुछ पर चुप्पी समय की तरह पसर गई है, 
ऐसे समय को हम कैसे लिख पाएँगे? 

पता नहीं यह हमारा समय है 
यहाँ हम किसी और समय में बलात् आ गए हैं 
इतना सपाट है यह समय 
कि इसमें कोई सलवटें, परतें, दरारें, नज़र नहीं आतीं 
और इससे भागने की कोई पगडंडी तक नहीं सूझती। 

हम अपना समय लिख नहीं पाएँगे। 
आगे पढ़ें

5 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर