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Hindi Kavita: अज्ञेय की कविता 'बेल-सी वह मेरे भीतर उगी है, बढ़ती है'

agyeya hindi kavita bel si vah mere bheetar ugi hai badhti hai
                
                                                         
                            


बेल-सी वह मेरे भीतर उगी है, बढ़ती है
उस की कलियां हैं मेरी आंखें,
कोंपलें मेरी अंगुलियों में अंकुराती हैं;
फूल-अरे, यह दिल में क्या खिलता है।

सांस उस की पंखुड़ियां सहलाती हैं,
बांहें उसी के वलय में बंध कसमसाती हैं।
बेल-सी वह मेरे भीतर उगी है, बढ़ती है,
जितना मैं चुकता जाता हूं,
वह मुझे ऐश्वर्य से मढ़ती है। 

2 वर्ष पहले

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