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भोजपुरी विशेष : कैलाश गौतम ने अपने काव्य में  ग्रामीण जीवन शैली की उठापटक को बखूबी दर्ज किया...

कैलाश गौतम
                
                                                         
                            चाल सुधारा चाल सुधारा
                                                                 
                            
बरखा रानी चाल सुधारा

कब्बौ झूरा कब्बौ बाढ़
केसे केसे लेईं राढ़
खेतवन से बस दुआ बंदगी
खरिहनवन से भाई चारा॥

सोच समझ के पाठ पढ़ावा
पानी में जिन आग लगावा
कब तक रहबू आसमान पर
तू निचवों तनी निहारा॥

फगुन चइत में पानी पानी
सावन-भादों में बेइमानी
जेही क कुल छाजन-बाजन
वहिके पतरी खंडा बारा।

लोककवि कैलाश गौतम अपनी किस्म के एकदम अनोखे कवि थे। लोकभाषा में रचे उनके गीतों-कविताओं में रस, अनुपम छंद, संवेदनाएं, मनोरंजन और लोकजीवन की उपस्थिति मिलेगी। उनके गीत आंचलिक बिम्बों से पटे पड़े हैं। कभी बारिश से गुहार, कभी कुंभ की भीड़ को अपने काव्य में उकेर देते हैं। आगे पढ़ें

सिर फूटत हौ, गला कटत हौ, लहू बहत हौ, गान्ही जी

8 वर्ष पहले

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