चाल सुधारा चाल सुधारा
बरखा रानी चाल सुधारा
कब्बौ झूरा कब्बौ बाढ़
केसे केसे लेईं राढ़
खेतवन से बस दुआ बंदगी
खरिहनवन से भाई चारा॥
सोच समझ के पाठ पढ़ावा
पानी में जिन आग लगावा
कब तक रहबू आसमान पर
तू निचवों तनी निहारा॥
फगुन चइत में पानी पानी
सावन-भादों में बेइमानी
जेही क कुल छाजन-बाजन
वहिके पतरी खंडा बारा।
लोककवि कैलाश गौतम अपनी किस्म के एकदम अनोखे कवि थे। लोकभाषा में रचे उनके गीतों-कविताओं में रस, अनुपम छंद, संवेदनाएं, मनोरंजन और लोकजीवन की उपस्थिति मिलेगी। उनके गीत आंचलिक बिम्बों से पटे पड़े हैं। कभी बारिश से गुहार, कभी कुंभ की भीड़ को अपने काव्य में उकेर देते हैं।
सिर फूटत हौ, गला कटत हौ, लहू बहत हौ, गान्ही जी
ग्रामीण जीवन शैली की उठापटक को उन्होंने अपने कविताओं और गीतों बखूबी दिखाया। गांव गया था, गांव से भागा’, ’अमवसा क मेला’, ’सब जैसा का तैसा’, ’गान्ही जी’ और ‘कचहरी न जाना’ जैसी उनकी कविताएं और गीत लोकप्रियता का पैमाना बन गए थे। ‘बाबू आन्हर माई आन्हर’ जैसे गीत कबीरी परम्परा के बिना नहीं आ सकते थे। 'गान्ही जी' कविता में देश की वर्तमान स्थिति से चिंतित कवि गांधी से शिकायत करता है -
सिर फूटत हौ, गला कटत हौ, लहू बहत हौ, गान्ही जी
देस बँटत हौ, जइसे हरदी धान बँटत हौ, गान्ही जी
बेर बिसवतै ररूवा चिरई रोज ररत हौ, गान्ही जी
तोहरे घर क’ रामै मालिक सबै कहत हौ, गान्ही जी।
हिंसा राहजनी हौ बापू, हौ गुंडई, डकैती, हउवै
देसी खाली बम बनूक हौ, कपड़ा घड़ी बिलैती, हउवै
छुआछूत हौ, ऊँच नीच हौ, जात-पाँत पंचइती हउवै
भाय भतीजा, भूल भुलइया, भाषण भीड़ भँड़इती हउवै।
भक्ति के रंग में रँगल गाँव देखा
इलाहबाद में हर साल लगने वाले कुम्भ मेले को जब उन्होंने अपने कविता का विषय बनाया तो उसके पीछे के कारणों के बारे में कहते थे, ''विश्व का सबसे बड़ा मेला इलाहबाद में लगता है। कभी कुम्भ के रूप में कभी अर्धकुम्भ के रूप में, मैंने बचपन से अपने दादा-दादी को, माता-पिता को मेले में आने की तैयारी करते हुए देखा है।
रेडियो इलाहबाद में होने के कारण पिछले कई साल से मैं भी इस मेले का हिस्सा रहा। चूँकि अमावस्या के पावन पर्व पर सबसे अधिक भीड़ लगती है इसलिए मैंने कविता का शीर्षक भी "अमौसा क मेला" रखा। हर बड़े मेले में भीड़ का चेहरा एक सा होता है। कई बार इस भीड़ के चलते दुर्घटनाएं भी हो जाती हैं। चाहे वो नासिक का कुम्भ रहा हो या हरिद्वार का, 1954 से बहुत लोग मरे, पर मैंने इस कविता में छोटी-बड़ी घटनाओं को पकड़ा, जहां जिंदगी है मौत नहीं है, हंसी है दुख नहीं है।
भक्ति के रंग में रँगल गाँव देखा,
धरम में, करम में, सनल गाँव देखा।
अगल में, बगल में सगल गाँव देखा,
अमौसा नहाये चलल गाँव देखा।
एहू हाथे झोरा, ओहू हाथे झोरा,
कान्ही पर बोरा, कपारे पर बोरा।
कमरी में केहू, कथरी में केहू,
रजाई में केहू, दुलाई में केहू।
आजी रँगावत रही गोड़ देखा
हँसत हँउवे बब्बा, तनी जोड़ देखा।
घुँघटवे से पूछे पतोहिया कि, अईया,
गठरिया में अब का रखाई बतईहा।
काबिलियत को किसी ख़ास विधा में बाँधा नहीं जा सकता
8 जनवरी 1944 को उत्तर प्रदेश के चंदौली में जन्मे जनकवि कैलाश गौतम की रचनात्मकता की काबिलियत को किसी ख़ास विधा में बाँधा नहीं जा सकता। वे गीत, नवगीत, कविता तो लिखते ही रहे गद्यलेखन भी उन्होंने खूब किया। अंधाधुंध शहरीकरण के चलते आज बहुत सारे गांव दम तोड़ने लगे हैं, रोजगार की तलाश में युवा गावों से शहरों की ओर भाग रहे हैं। कैलाशजी ने जब यह महसूस किया तब अपनी कविता "गांव गया था गाँव से भागा" में लिखा -
गांव गया था
गांव से भागा
सरकारी स्कीम देखकर
बालू में से क्रीम देखकर
देह बनाती टीम देखकर
हवा में उड़ता भीम देखकर
सौ-सौ नीम हकीम देखकर
गिरवी राम-रहीम देखकर
गांव गया था
गांव से भागा।
'कविता लौट पड़ी', तीन चौथाई आन्हर, जोड़ा ताल, सिर पर आग, बिना कान का आदमी, सीली माचिस की तीलियाँ कैलाश गौतम के काव्य संग्रह हैं। अपने जीवन के अंतिम समय में आकाशवाणी से रिटायरमेंट के बाद कैलाश गौतम इलाहाबाद में हिंदुस्तानी एकेडमी के अध्यक्ष पद पर कार्यरत थे। ग्रामीण जीवन के बिम्बों के इस प्रयोगधर्मी कवि का निधन 9 दिसंबर 2006 को हुआ।
अखिल भारतीय मंचीय कवि परिषद की ओर से शारदा सम्मान, महादेवी वर्मा साहित्य सहकार न्यास की ओर से महादेवी वर्मा सम्मान, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का राहुल सांकृत्यायन सम्मान सहित कैलाश गौतम मुम्बई का परिवार सम्मान, लोक भूषण सम्मान, सुमित्रानन्दन पंत सम्मान और ऋतुराज सम्मान से भी सम्मानित किया गया। अपने वाराणसी अधिवास के दौरान कैलाश गौतम 'आज' और 'गांडीव' जैसे दैनिक पत्र समूह से भी जुड़े रहे। सन्मार्ग के लिए भी उन्होंने नियमित स्तम्भ लिखा।
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सिर फूटत हौ, गला कटत हौ, लहू बहत हौ, गान्ही जी
8 वर्ष पहले
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