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विश्व कविता दिवस पर विदेशी साहित्य से हिंदी में अनूदित 5 कविताएं

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                            आकस्मिक मुलाकात - विस्लावा शिम्बोर्स्का
                                                                 
                            

हम मिले बड़े सलीके और शिष्टाचार के साथ 
हमने कहा- कितनी खुशी हुई आपको इतने सालों बाद देखकर 
पर हमारे भीतर थककर सो गया था बहुत-कुछ 

घास खा रहा था शेर, बाज ने अपनी उड़ान छोड़ दी थी 
मछलियाँ डूब गई थीं और भेड़िए पिंजरों में बन्द थे 
हमारे साँप अपनी केंचुल बदल चुके थे 
मोरों के पंख झड़ गए थे 
उल्लू तक नहीं उड़ते थे हमारी रातों में 
हमारे वाक्य टूट कर ख़ामोश हो गए 

असहाय-सी मुस्कान में खो गई
हमारी इंसानियत
जो नहीं जानती कि आगे क्या कहे 

'जब तुम बूढ़ी हो जाओगी' - विलियम बट्लर येट्स

जब तुम बूढ़ी, पके बालों वाली और नींद से बोझिल होगी
और आग के समीप बैठ कर ऊंघोगी, इस क़िताब को उठा लेना
और धीरे से पढ़ना, उस सौम्य नज़र के बारे में सोचना
जो तुम्हारी आंखों में कभी थी और उनकी गहरी झलक के बारे में सोचना

कितने ही लोगों ने प्रेम किया तुम्हारे ख़ुशनुमा अनुग्रह के क्षणों को
और झूठे या सच्चे प्रेम से चाहा तुम्हारी सुन्दरता को
लेकिन एक आदमी प्यार करता था तुम्हारी पावन आत्मा को
और तुम्हारे बदलते चेहरे के दुखों को

और गर्म छड़ों की बगल में नीचे झुकते हुए
दुख से बड़बड़ाना, प्यार कैसे उड़ गया
और चढ़ गया ऊपर पहाड़ों पर
और छिपा दिया अपना चेहरा तारों की भीड़ में


मूल अंग्रेज़ी से सरिता शर्मा द्वारा अनूदित
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'जब तुम बूढ़ी हो जाओगी' - विलियम बट्लर येट्स

5 वर्ष पहले

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