वर्षों पहले अमेरिका के 16वें राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने अपने बेटे के शिक्षक को एक पत्र लिखा था। इस शिक्षक दिवस के मौके पर इस पत्र के कुछ अंश।
हे शिक्षक!
मैं जानता हूं और मानता हूं
कि न तो हर आदमी सही होता है
और न ही होता है सच्चा;
किंतु तुम्हें सिखाना होगा कि
कौन बुरा है और कौन अच्छा
दुष्ट व्यक्तियों के साथ-साथ आदर्श प्रणेता भी होते हैं,
स्वार्थी राजनीतिज्ञों के साथ-साथ समर्पित नेता भी होते हैं
दुश्मनों के साथ-साथ मित्र भी होते हैं
हर विरूपता के साथ सुंदर चित्र भी होते हैं
समय भले ही लग जाए, पर
यदि सिखा सको तो उसे सिखाना
कि पाए हुए पांच से अधिक मूल्यवान है -
स्वयं एक कमाना
पाई हुई हार को कैसे झेले, उसे यह भी सिखाना
और साथ ही सिखाना, जीत की ख़ुशियां मनाना।
यदि हो सके तो उसे ईर्ष्या या द्वेष से परे हटाना
और जीवन में छुपी मौन मुस्कान का पाठ पढ़ाना।
जितनी जल्दी हो सके उसे जानने देना
कि दूसरों को आतंकित करने वाला स्वयं कमज़ोर होता है,
वह भयभीत व चिंतित है
क्योंकि उसके मन में स्वयं चोर होता है।
उसे दिखा सको तो दिखाना -
किताबों में छिपा खजाना।
और उसे वक़्त देना चिंता करने के लिए
कि आकाश के परे उड़ते पंछियों का आह्लाद
सूर्य के प्रकाश में मधुमक्खियों का निनाद
हरी-भरी पहाड़ियों से झांकते फूलों का संवाद
कितना विलक्षण होता है - अविस्मरणीय, अगाध
उसे यह भी सिखाना -
धोके से सफ़लता पाने से असफ़ल होना सम्माननीय है
और अपने विचारों पर भरोसा रखना अधिक विश्वसनीय है
चाहें अन्य सभी उनको ग़लत ठहराएं
परंतु स्वयं पर अपनी आस्था बनी रहे, यह विचारणीय है।
उसे यह भी सिखाना कि वह सदय का साथ सदय हो
किंतु कठोर के साथ हो कठोर।
और लकीर का फ़कीर बनकर
उस भीड़ के पीछे न भागे जो करती हो - निरर्थक शोर।
उसे सिखाना
कि वह सबकी सुनते हुए अपने मन की भी सुन सके,
हर तथ्य को सत्य की कसौटी पर कसकर गुन सके।
यदि सिखा सको तो सिखाना कि वह दुख में भी मुस्कुरा सके,
घनी वेदना से आहत हो, पर ख़ुशी के गीत गा सके।
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