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घिर गया नभ, उमड़ आए मेघ काले: अज्ञेय 

agyeya
                
                                                         
                            घिर गया नभ, उमड़ आए मेघ काले,
                                                                 
                            
भूमि के कंपित उरोजों पर झुका-सा, विशद, श्वासाहत, चिरातुर-
छा गया इंद्र का नील वक्ष-वज्र-सा, यदि तड़ित से झूलता हुआ-सा।
आह, मेरा श्वास है उत्तप्त-
धमनियों में उमड़ आई है लहू की धार-
प्यार है अभिशप्त : तुम कहाँ हो नारि?
मेघ व्याकुल गगन को मैं देखता था, बन विरह के लक्षणों की मूर्ति-
सूक्ति की फिर नायिकाएँ, शास्त्रसंगत प्रेम क्रीड़ाएँ,
घुमड़ती थीं बादलों में आदर, कच्ची वासना के धूम-सी।
जबकि सहसा तड़ित के आघात से घिरकर
फूट निकला स्वर्ग का आलोक। बाह्य देखा :
स्नेह से आलिप्त, बीज के भवितव्य से उत्फुल्ल,
बद्ध-वासना के पंक-सी फैली हुई थी
धारयित्री-सत्य-सी निर्लज्ज, नंगी, औ' समर्पित।
6 वर्ष पहले

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