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मुझको इस आग से बचाओ मेरे दोस्तों: रमाशंकर यादव 'विद्रोही'

काव्य चर्चा

वो आग एक औरत की जली हुई लाश की आग है वो आग इंसानों की बिखरी हुई हड्डियों की आग है

अमर उजाला, काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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जीवन स्थायित्व की तलाश करता है। जे.एन.यू के इस कवि ने अस्थायित्व को चुना। बेघर रहा, हर रात का दर ही उसका घर रहा। जहाँ शाम हो जाए, जहाँ नींद आ जाए वहीं घर हो जाए। उन्होंने जीवन इसी तरह जिया। रमा शंकर यादव नाम मिटता गया और वह विद्रोही बनता गया, कवि विद्रोही और विद्रोह का कवि।

मैं साईमन न्याय के कटघरे में खड़ा हूँ
प्रकृति और मनुष्य मेरी गवाही दें
मैं वहाँ से बोल रहा हूँ जहाँ
मोहनजोदड़ो के तालाब की आख़िरी सीढ़ी है
जिस पर एक औरत की जली हुई लाश पड़ी है
और तालाब में इंसानों की हड्डियाँ बिखरी पड़ी हैं



इसी तरह से एक औरत की जली हुई लाश
बेबीलोनिया में भी मिल जाएगी
और इंसानों की बिखरी हुई हड्डियाँ मेसोपोटामिया में भी
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