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पलट के माओं के लख़्त-ए-जिगर नहीं आते: साबिर ज़फ़र

लट के माओं के लख़्त-ए-जिगर नहीं आते: साबिर ज़फ़र
                
                                                         
                            जिधर हो ज़िंदगी मुश्किल उधर नहीं आते 
                                                                 
                            
अजल से पहले मिरे चारा-गर नहीं आते 

बना हुआ है मिरा शहर क़त्ल-गाह कोई 
पलट के माओं के लख़्त-ए-जिगर नहीं आते 

उठाए अपनों की लाशें जो तुम हो नौहा-कुनाँ 
मिरे शहीद तुम्हें क्यूँ नज़र नहीं आते 

न इंतिज़ार करो इन का ऐ अज़ा-दारो 
शहीद जाते हैं जन्नत को घर नहीं आते 

मैं नौहे कब नहीं लिखता हूँ रफ़्तगाँ के 'ज़फ़र' 
कब अश्क मिस्ल-ए-हुरूफ़-ए-हुनर नहीं आते 
5 वर्ष पहले

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