जिधर हो ज़िंदगी मुश्किल उधर नहीं आते
अजल से पहले मिरे चारा-गर नहीं आते
बना हुआ है मिरा शहर क़त्ल-गाह कोई
पलट के माओं के लख़्त-ए-जिगर नहीं आते
उठाए अपनों की लाशें जो तुम हो नौहा-कुनाँ
मिरे शहीद तुम्हें क्यूँ नज़र नहीं आते
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