नज़ीर अकबराबादी ने लगभग हर त्यौहार पर नज़्म कहीं हैं। ऐसे में बसंत कैसे रह सकता था, उन्होंने बसंत को 11 नज़्मों में लिखा है। पढ़ें उन नज़्मों से ख़ास हिस्से
1.
मिलकर सनम से अपने हंगाम दिल कुशाई।
हंसकर कहा यह हमने ऐ जां! बसंत आई।
सुनते ही उस परी ने गुल गुल शगुफ़्ता होकर।
पोशाक ज़र फ़िशानी अपनी वोंही रंगाई।
जब रंग के आई उसकी पोशाक पुर नज़ाकत।
सरसों की शाख़ पुर गुल फिर जल्द एक मंगाई।
एक पंखुड़ी उठाकर नाजुक सी उंगलियों में।
रंगत फिर उसकी अपनी पोशाक से मिलाई।
साथ लगा जब तो अ़जब ऐश का दहाड़ा।
जिस बाग़ में गेंदों के गए उसको उखाड़ा।
देखी कभी सरसों कभी नरगिस को उजाड़ा।
कहते थे इसी बात को बन, झाड़, पहाड़।
सबकी तो बसन्तें हैं पै यारों का बसन्ता॥
खु़श बैठे हैं सब शाहो वजीर आज अहा हा!।
दिल शाद हैं अदनाओ फ़क़ीर आज अहा हा!।
बुलबुल की निकलती है सफ़ीर आज अहा हा!।
कहता यही फिरता है ”नज़ीर“ आज अहा हा!।
सबकी तो बसन्तें हैं पै यारों का बसन्ता॥
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