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नये अख़बार में आओ कोई ऐसी ख़बर ढूंढें

Naye akhabaar men aao koi aisi khabar dhoondhen
                
                                                         
                            इधर ढूँढें, उधर ढूँढें, कहाँ ढूँढें, किधर ढूँढें
                                                                 
                            
समझ में अब यही आता है ख़ुद को दर-ब-दर ढूँढें

मिले जी को सुक़ूँ जिससे, फ़रेबों से तिही हो जो
नए अख़बार में आओ कोई ऐसी ख़बर ढूँढें

हुआ ग़ायब है जिनका जी उन्हें मिल जाएगा पक्का
वो अपना जी नहीं ऐ बेवफ़ा तुझको अगर ढूँढें

किसी वीरान सी शब में कभी दिल के दरीचे से
हमें देखी थी जो वह क्यूँ न उल्फ़त की नज़र ढूँढें

किसी भी चीज़ की गोया नहीं ख़्वाहिश रही अपनी
न जाने क्यूँ है कहता जी के हम तुझको मगर ढूँढें

चला होगा यक़ीनन, राह में गुम हो गया होगा
चलो ग़ाफ़िल हम अब अपनी दुआओं का असर ढूँढें

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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8 वर्ष पहले

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