रफ़ी साहब और संगीतकार नौशाद के संबंध बहुत अच्छे थे। नौशाद साहब ने मोहम्मद रफ़ी के प्रति अपने लगाव को कुछ शेरों और नज़्मों के माध्यम से व्यक्त किया।
अल्लाह-अल्लाह रफ़ी की आवाज़
रूहे-महमूदो-जान-ए-बज़्मे-अयाज
उसकी हर तान, उसकी हर लय पर
बजने लगते थे ख़ुद दिलों के साज़।।
गायकी है हुस्न-ए-फ़न तेरा रफ़ी
तेरे फ़न पे हम सभी को नाज़ है
तेरे शाहकोरों ने समझाया हमें
ज़िदगानी प्यार का इक साज़ है
मेरी सरगम में भी तेरा जिक्र है
मेरे गीतों में भी तेरी आवाज है
गूंजते हैं तेरे नग़मों से अमीरी के महल
झोपड़ी में भी ग़रीबों के तेरी आवाज है
अपनी मौसीक़ी पे सबको फ़ख़्र होता है मगर
मेरे साथी आज मौसीक़ी को तुझ पर नाज़ है
शख़्सियत दिल नवाज़ रखता था
क्या गले में गुदाज़ रखता था
अपने हों या पराये सब के लिए
दिल का दरवाज़ा बाज रखता था
आगे पढ़ें
गूंजते हैं तेरे नग़मों से अमीरी के महल
कमेंट
कमेंट X