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हारिस बिलाल: हमारे रास्ते में कोई मजबूरी नहीं आती

haris bilal famous ghazal hamare raste mein koi majboori nahin aati
                
                                                         
                            

हमारे रास्ते में कोई मजबूरी नहीं आती
ख़ुदा का शुक्र है दुनिया हमें पूरी नहीं आती

यहाँ साँसें कमाने का भी इतना बोझ होता है
मशक़्क़त जिस्म खा जाती है मज़दूरी नहीं आती

मैं उन को एक दूजे की भली बातें बताता हूँ
सुना है इस तरह लोगों में मग़रूरी नहीं आती

मुझे दरपेश है घर में बसी दुनिया की रखवाली
मगर दफ़्तर से इक अफ़सर की मंज़ूरी नहीं आती

जो सज्दों में रखे जाएँ वो नेज़ों पर भी आते हैं
ख़ुदा के नाम-लेवाओं पे मा'ज़ूरी नहीं आती

मैं उस मजमा' का हिस्सा हूँ जहाँ लोगों के हिस्से में
बदन पर पूरे कपड़े हों तो मश्हूरी नहीं आती

बहुत नज़दीक होना भी वफ़ा का 'ऐब है 'हारिस'
ज़रा से फ़ासले पर दरमियाँ दूरी नहीं आती

एक घंटा पहले

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