-मजाज़ लखनवी-
जिगर और दिल को बचाना भी है
नज़र आप ही से मिलाना भी है
मोहब्बत का हर भेद पाना भी है
मगर अपना दामन बचाना भी है
ये बिजली चमकती है क्यूं दम-ब-दम[1]
चमन में कोई आशियाना भी है
ख़िरद[2] की इताअत[3] ज़रूरी सही
यही तो जुनूं का ज़माना भी है
न दुनिया न उक़्बा[4] कहां जाइए
कहीं अहल-ए-दिल का ठिकाना भी है
मुझे आज साहिल पे रोने भी दो
कि तूफ़ान में मुस्कुराना भी है
ज़माने से आगे तो बढ़िए 'मजाज़'
ज़माने को आगे बढ़ाना भी है
1.हर पल, लगातार, हर लम्हा,पल-पल 2.बुद्धि,तर्क, समझदारी,विवेक 3.आज्ञाकारिता,आज्ञापालन 4.अगली दुनिया, दूसरी दुनिया
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