तुम्हारे नील झील-से नैन,
नीर निर्झर-से लहरे केश|
तुम्हारे तन का रेखाकार
वही कमनीय, कलामय हाथ
कि जिसने रुचिर तुम्हारा देश
रचा गिरि-ताल-माल के साथ,
करों में लतरों का लचकाव,
करतलों में फूलों का वास,
तुम्हारे नील झील-से नैन,
नीर निर्झर-से लहरे केश|
उधर झुकती अरुनारी साँझ,
इधर उठता पूनो का चाँद,
सरों, श्रॄंगों, झरनों पर फूट
पड़ा है किरनों का उन्माद,
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तुम्हारे नील झील-से नैन...
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