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है क़सम तुझको बता दे कि वो क्या थी तेरी : ज़िया ज़मीर

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                            वो जो बेसाख्ता हंसने की अदा थी तेरी,
                                                                 
                            
तुझको मालूम नहीं वो ही दवा थी तेरी।

हिज्र रातों में उसे ओढ़ के सो जाता था,
पास मेरे जो उदासी की रिदा थी तेरी।

तेरे एक दोस्त ने पूछा था ये रो कर मुझसे,
है क़सम तुझको बता दे कि वो क्या थी तेरी?

बद्दुआ अपने लिए ख़ूब करी थी मैंने,
हां मगर राह में हायल जो दुआ थी तेरी।

तेरी आवाज पे लौट आए थे तेरी जानिब,
पूछना कुछ भी नहीं था कि रज़ा थी तेरी।

- ज़िया ज़मीर

... उसको सहरा नहीं कह देना समंदर कहना

उसकी ख़्वाहिश पे नए शेर बराबर कहना
और फिर सुन के उन्हें उसका मुकर्रर कहना

ख़ुश्क आंखें लिए हंसता हुए देखो जिसको
उसको सहरा नहीं कह देना समंदर कहना

क्या अजब है कि हो बेटे की फक़त हार पे हार
और मां का उसे हर बार सिकंदर कहना

यह तो हम हैं बड़े दिल वाले जो कह देते हैं
वरना आसान नहीं अपने से बेहतर कहना

पहले हम मीर के कदमों को ज़रा चूम आएं
बाद में यारो हमें खुल के सुख़नवर कहना

इश्क के मारों को कहना नहीं देखो कुछ भी
और अगर कहना ही चाहो तो क़लंदर कहना

- ज़िया ज़मीर

(ज़िया ज़मीर आज के दौर के मकबूल  शायरों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं। मुरादाबाद निवासी ज़िया ज़मीर को शायरी और अदब विरासत में मिला है। )
8 वर्ष पहले

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