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क्या भूलूं क्या याद करूं मैं - हरिवंशराय बच्चन

harivansh rai bachchan hindi kavita kya bhuloon kya yaad karun main
                
                                                         
                            

अगणित उन्मादों के क्षण हैं,
अगणित अवसादों के क्षण हैं,
रजनी की सूनी घड़ियों को किन-किन से आबाद करूं मैं
क्या भूलूं, क्या याद करूं मैं

याद सुखों की आंसू लाती,
दुख की, दिल भारी कर जाती,
दोष किसे दूं जब अपने से, अपने दिन बर्बाद करूं मैं
क्या भूलूं, क्या याद करूं मैं

दोनों करके पछताता हूं,
सोच नहीं, पर मैं पाता हूं,
सुधियों के बंधन से कैसे अपने को आबाद करूं मैं
क्या भूलूं, क्या याद करूं मैं

5 वर्ष पहले

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